Thursday, September 29, 2022
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विनोद खन्ना की बर्थ एनिवर्सरी: जब फिल्मों में एंट्री की बात सुनकर पिता ने विनोद खन्ना पर तान दी थी पिस्तौल, जब स्टारडम हासिल कर लिया तो सबकुछ छोड़ बन गए थे संन्यासी

विनोद खन्ना की बर्थ एनिवर्सरी: जब फिल्मों में एंट्री की बात सुनकर पिता ने विनोद खन्ना पर तान दी थी पिस्तौल, जब स्टारडम हासिल कर लिया तो सबकुछ छोड़ बन गए थे संन्यासी

 

 

बॉलीवुड के सबसे हैंडसम एक्टर कहे जाने वाले विनोद खन्ना की 6 अक्टूबर को बर्थ एनिवर्सरी है। बहरहाल, विनोद का नाम इंडस्ट्री के उन एक्टर्स में गिना जाता है जिन्होंने अपनी फिल्मी पारी में कई उतार-चढ़ाव देखे। विलेन बनकर करियर की शुरुआत की और फिर हीरो बनकर फिल्मी परदे पर छा गए।

1969 में आई 'मन का मीत' विनोद खन्ना की पहली फिल्म थी।

1969 में आई ‘मन का मीत’ विनोद खन्ना की पहली फिल्म थी।

सुनील दत्त ने दिया पहली बार परदे पर आने का मौका

विनोद खन्ना जो बचपन में बेहद शर्मीले थे, स्कूल के दौरान उन्हें एक टीचर ने जबरदस्ती नाटक में उतार दिया। यहीं से उन्हें एक्टिंग की तरफ रुझान हुआ। बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई के दौरान विनोद खन्ना ने ‘सोलहवां साल’ और ‘मुगल-ए-आज़म’ जैसी फिल्में देखीं और इन फिल्मों ने उन पर गहरा असर छोड़ा और हीरो बनने के लिए बेताब हो गए। विनोद मुंबई के सिडेनहेम कॉलेज में पढ़ रहे थे। बॉलीवुड में किसी से कोई जान-पहचान नहीं थी। बस शक्ल-सूरत आकर्षक और सुन्दर थी।

उनके साथ पढ़ने वाली लड़कियों उन्हें उकसाती कि इतनी शानदार पर्सनालिटी है, फिल्मों में ट्राय क्यों नहीं करते। एकदम हीरो मटेरियल हो। इसी बीच एक पार्टी के दौरान उन्हें निर्माता-निर्देशक सुनील दत्त से मिलने का अवसर मिला। सुनील उन दिनों अपनी फिल्म ‘मन का मीत’ के लिए नए चेहरों की तलाश कर रहे थे। उन्होंने फिल्म में विनोद से बतौर को-एक्टर काम करने का ऑफर दिया। फिल्म तो पिट गई पर विनोद खन्ना की गाड़ी चल पड़ी।

फिल्म 'मेरा गांव मेरा देश' (1971) के एक सीन में डाकू जब्बर सिंह की भूमिका में विनोद खन्ना।

फिल्म ‘मेरा गांव मेरा देश’ (1971) के एक सीन में डाकू जब्बर सिंह की भूमिका में विनोद खन्ना।

एक्टिंग करने के लिए कहा तो पिता ने तान दी पिस्तौल
‘मन का मीत’ की शूटिंग शुरू करने से पहले का वाकया भी बहुत मजेदार रहा। सुनील दत्त से ऑफर मिलने के बाद जब ये बात विनोद ने घर पहुंचकर अपने पिता को बताई तो वे बहुत गुस्सा हुए। यहां तक कि उनके पिता ने उन पर पिस्तौल भी तान दी और कहा कि यदि तुम फिल्मों में गए तो तुम्हें गोली मार दूंगा। विनोद खन्ना अड़े रहे पर बाद में विनोद की मां ने बीच बचाव किया। उनकी समझाइश पर विनोद के पिता ने फिल्मों में दो वर्ष तक काम करने की इजाजत दे दी। उन्होंने शर्त रखी कि इंडस्ट्री में सफल नहीं हुए तो घर के बिजनेस में हाथ बंटाना होगा।

डाकू के किरदार और स्टंट की काबिलियत से बनाई पहचान
पहली फिल्म तो असफल रही, लेकिन इस फिल्म में उन्हें नोटिस किया गया। उन्हें फिल्मों में पैर जमाने की जगह मिल गई थी। इसके बाद ‘सच्चा झूठा’, ‘आन मिलो सजना’, ‘मेरा गांव मेरा देश’ जैसी फिल्मों में खलनायक की भूमिकाएं निभाने का अवसर मिला। ‘मेरा गांव मेरा देश’ में जब विनोद डाकू बने और उन्होंने धर्मेंद्र को जमकर टक्कर दी तो कई निर्देशकों की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने तमाम खतरनाक सीन खुद किए। जैसे घोड़े पर सवार होकर बीहड़ और जंगलों में भागना और फाइटिंग सीन। हालांकि उन्हें सफलता गुलजार की फिल्म ‘मेरे अपने’ से मिली। फिल्म में विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा के बीच गजब का टकराव दिखाया गया था। उस दौर में एक्टर्स पर स्टीरियोटाइप होने का भी ठप्पा लग जाता था। एक बार खलनायक बन गए तो निर्माता हमेशा ही खलनायक वाले रोल ही ऑफर करते थे। भला हो गुलजार का जिन्हें विनोद खन्ना में एक डैशिंग हीरो नजर आया और फिर ‘अचानक’ (1973) में उन्होंने विनोद की इमेज ही बदल दी।

जब अमृता का दिल आया विनोद पर
ये बात तब की है जब विनोद संन्यासी जीवन से निकलकर फिर से बॉलीवुड में आए थे। वे फिल्म ‘बंटवारा’ की शूटिंग कर रहे थे जिसमें उनके साथ अमृता सिंह भी थीं। उन दिनों अमृता क्रिकेटर रवि शास्त्री को डेट कर रही थीं और उन्हें चिढ़ाने के लिए वे विनोद खन्ना से फ्लर्ट करती थीं। एक दिन रवि ने अमृता से कहा कि वे विनोद को इंप्रेस नहीं कर पाएंगी। बस ये बात अमृता को चुभ गई। इधर विनोद भी अकेले थे तो वे भी धीरे-धीरे अमृता की ओर बढ़ने लगे। दोनों के अफेयर की खबरें फिल्मी गलियारों में उड़ने लगी। अमृता की मां को जब ये पता चला तो उन्होंने अमृता को उसके ब्राइट करियर का वास्ता देकर विनोद से राहें अलग करने के लिए समझाया। धीरे-धीरे अमृता को भी यह समझ आ गया और उन्होंने अपने करियर की खातिर विनोद खन्ना से दूरी बना ली।

सीधे घर पहुंचे और कविता को किया शादी के लिए प्रपोज
विनोद खन्ना की दूसरी पत्नी कविता उनसे 16 साल छोटी थीं। साल 1988 में दोनों पहली बार एक पार्टी में मिले। कविता जैसे ही अपनी सहेलियों के साथ पार्टी में पहुंची विनोद उन्हें देखते रह गए। कई दिनों बाद उनकी कविता से दोबारा पार्क में मुलाकात हुई। फिर एक दिन विनोद बैडमिंटन खेलकर पसीने में लथपथ सीधे कविता के घर पहुंचे और उनको शादी के लिए प्रपोज कर दिया। कविता ने भी हामी दे दी।

मोहभंग: स्टारडम दांव पर लगाकर बन गए ‘सेक्सी संन्यासी’
विनोद खन्ना को अमिताभ बच्चन के बराबर स्टारडम वाला अभिनेता माना जाता था। 70 और 80 के दशक में ‘काउंटर कल्चर’ मूवमेंट चल रहा था। इन्हीं दिनों विनोद पर खन्ना पीक पर अपना स्टारडम छोड़कर अमेरिका के ओरेगोन स्थित रजनीशपुरम आश्रम चले गए। उन्हीं दिनों विनोद की मां का निधन भी हुआ था और वे दुखी थे। उनके साथ महेश भट्ट भी तब संन्यासी बने थे। कहा तो यह भी जाता है कि महेश भट्ट ने ही विनोद खन्ना को संन्यासी बनने के लिए राजी किया था। आश्रम में विनोद खन्ना रजनीश की माला पहने घूमते थे। इसीलिए मीडिया ने उन्हें ‘सेक्सी संन्यासी’ की संज्ञा दी थी।

विनोद खन्ना के आखिरी दिनों की फिल्में
‘वॉन्टेड’, ‘दबंग’ और ‘दबंग 2’ में सलमान के पिता की भूमिका निभाई। आखिरी बार वह साल 2015 में शाहरुख खान की फिल्म ‘दिलवाले’ में दिखे थे। 27 अप्रैल 2017 को कैंसर से उनका निधन हुआ था। अपने आखिरी दिनों में उनकी एक इच्छा थी जो अधूरी रह गई। वो पाकिस्तान में अपना पुस्तैनी घर देखना चाहते थे।

 

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