Sunday, September 25, 2022
Home बॉलीवुड लिखने का शोक खेलने की उम्र में ही लग गया था :गुलजार

लिखने का शोक खेलने की उम्र में ही लग गया था :गुलजार



शब्दों के जादूगर जाने-माने वाले गीतकार गुलजार 18 अगस्त 1934 को झेलम जिले के दीना गांव में जो अब पाकिस्तान में है में पैदा हुए। उनका असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है और वह बॉलीवुड में आने से पहले गैराज में एक मकेनिक के तौर पर काम किया करते थे| उनको लिखने का शौक खेलने की उम्र से ही लग गया था मतलब बचपन से ही। लेकिन उनके पिता को यह पसंद नहीं था। लेकिन पिता के लाख मना करने के बाद भी गुलजार ने अपनी कलम नहीं रोकी। एक दिन आया जब उन्हें मुंबई की फिल्मी नगरी में एंट्री मिल ही गई। फिर तो उन्होंने बिमल रॉय के साथ बतौर असिस्टेंट काम करना शुरू कर दिया और एस.डी. बर्मन की फिल्म ‘बंदिनी’ से बतौर गीतकार शुरुआत की। बता दें कि उनका पहला गाना था ‘मोरा गोरा अंग’। बतौर डायरेक्टर उनकी पहली फिल्म ‘मेरे अपने’ (1971) थी। यह फिल्म बंगाली फिल्म ‘अपनाजन’ की रीमेक थी। शायद ही आपको पता हो कि गुलजार की फिल्मों की एक खासियत हुआ करती थी कि उनकी फिल्मों में फ्लैशबैक देखने को बहुत मिलता था। क्योंकि गुजलार का कहना है कि बिना अतीत दिखाए फिल्म समझी नहीं जा सकती। फ्लैशबैक की बात करें तो फिल्म किताब, इजाजत और आंधी इसका उदाहरण हैं। एक और बात उस समय के पाकिस्तान में पैदा होने का उनपर यह असर भी पड़ा कि उनकी उर्दू में बहुत दिलचस्पी थी इसलिए वह उर्दू में ही अपनी कविता लिखा करते थे। यहां तक कि फिल्मों के लिए गुलजार को साइन-लैंग्वेज भी सीखनी पड़ी। क्योंकि साल 1973 में आई फिल्म ‘कोशिश’ में एक्टर संजीव और जया भादुड़ी मूक-बधीर रोल में थे। गुलजार ने भले ही कितनी कहानियां और गाने लिखे हों लेकिन उनका ही लिखा गया फिल्म ‘गुड्डी’ का ये गीत ‘हमको मन की शक्ति देना’ आज भी स्कूल में प्रार्थना में गाया जाता है। लेकिन फिल्म ‘हू तू तू’ के फ्लॉप होने के बाद उन्होंने फिल्म डायरेक्शन से किनारा कर लिया। इस झटके से उबरने के लिए उन्होंने अपना ध्यान शायरी और कहानियों की ओर कर लिया। गुलजार को देखने के बाद लोगों के मन में अकसर एक सवाल जरूर आता होगा कि वह सफेद कुर्ते में ही क्यों रहते हैं। बता दें कि वह अपने कॉलेज के दिनों से ही सफेद कपड़े पहन रहे हैं।’कोशिश’ (1972), ‘अचानक’ (1973) ‘आंधी’ (1975), ‘मीरा’, ‘लेकिन’, ‘किताब’ (1977) और ‘इजाजत’ (1987) उनकी फेमस फिल्मों में शामिल हैं। बात करें उनके शौक की तो उन्हें टेनिस खेलना बहुत पसंद है और वह आज भी सुबह टेनिस खेले बिना नहीं रहते हैं। आखिर में बात करेंगे उनकी उपलब्धियों की तो बता दें कि वह 20 बार फिल्मफेयर, 5 राष्ट्रीय पुरस्कार अपनी झोली में डाल चुके हैं। साल 2010 में उन्हें फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनेयर’ के गाने ‘जय हो’ के लिए ग्रैमी अवार्ड मिला था। वहीं, साल 2013 में उन्हें दादा साहेब फालके पुरस्कार भी मिला।






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